| 歌曲 | Herbst |
| 歌手 | Nargaroth |
| 专辑 | Jahreszeiten |
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| [00:00.00] | 1 |
| [08:38.85] | Es sinkt die sterbende Sonne, |
| [08:52.35] | blutrot in nebligen Schlaf. |
| [09:00.63] | Es regt sich Bedauern im Herzen, |
| [09:09.42] | wo einst mein Scheitern mich traf. |
| [09:17.41] | |
| [09:18.46] | Es mahnet der Nornen Gesang, |
| [09:26.48] | an so viel schlafendes Einst. |
| [09:35.77] | Es brechen der Liebe Geschichte, |
| [09:44.55] | egal wie ernst du's auch meinst. |
| [09:52.36] | |
| [09:53.02] | Und meine Hände nun welk wie Papier, |
| [10:01.80] | verbrennen im herzkühlen Fehl. |
| [10:10.60] | und altes Lachen, das schaudernd mich macht |
| [10:19.38] | verlacht mich in all dem Weh'. |
| [11:12.74] | 2 |
| [12:40.92] | Es ruhen die Tränen wie junger Regen |
| [13:03.55] | auf bald schon sterbendem Gras |
| [13:11.58] | Sanft schmiegt sich Moos an wittere Wände |
| [13:18.85] | der Herzen die ich nie vergaß... |
| [13:24.67] | |
| [13:26.68] | Und keine Narbe blieb namenlos, |
| [13:34.20] | im Kampfe der Eitelkeit. |
| [13:41.98] | Verblutend wir blieben im Felde zurück |
| [13:49.51] | und lecken die Wunden der Zeit. |
| [13:55.28] | |
| [13:57.79] | Wo die Sehnsucht nach deiner Haut blieb? |
| [14:05.06] | Schreit es in mei'm Kopf allein. |
| [14:12.59] | Auf dass die allein an mir geschehe, |
| [14:20.87] | mit all ihrem Zweifel und Schrei'n. |
| [14:51.82] | 3 |
| [16:23.36] | Das fremde Bett, in das ich am Abend floh, |
| [16:30.76] | war gleich dem des Morgens so kalt. |
| [16:38.54] | Einst waren unsere Herzen vereint, |
| [16:46.32] | vordorrt nun, betrogen und alt. |
| [16:52.28] | |
| [16:54.10] | Ich habe so oft auch gelogen für dich, |
| [17:01.62] | egal bei oder mit wem du schliefst. |
| [17:09.15] | Es klebt noch ein fremder Hauch in deinem Haar, |
| [17:16.73] | der gleicht dem Dämon vor dem du fliehst. |
| [17:24.08] | |
| [17:24.51] | Seit langem schon wir uns nicht in die Augen sehn, |
| [17:32.04] | weil zu viele Küsse wir stahl'n. |
| [17:40.06] | Wir schneiden uns Nachts unsere Sünden ins Fleisch, |
| [17:47.34] | die da mahnen uns ewig der Qual'n. |
| [19:38.76] | 4 |
| [19:57.44] | Noch tausende Burgen wir trunken erklimmen, |
| [20:02.70] | die bald schon Ruinen sind. |
| [20:07.22] | Doch stehen ach noch nicht von steinernen Zinnen, |
| [20:11.99] | dass unsere Träume schon sterben im Wind. |
| [00:00.00] | 1 |
| [08:38.85] | Es sinkt die sterbende Sonne, |
| [08:52.35] | blutrot in nebligen Schlaf. |
| [09:00.63] | Es regt sich Bedauern im Herzen, |
| [09:09.42] | wo einst mein Scheitern mich traf. |
| [09:17.41] | |
| [09:18.46] | Es mahnet der Nornen Gesang, |
| [09:26.48] | an so viel schlafendes Einst. |
| [09:35.77] | Es brechen der Liebe Geschichte, |
| [09:44.55] | egal wie ernst du' s auch meinst. |
| [09:52.36] | |
| [09:53.02] | Und meine H nde nun welk wie Papier, |
| [10:01.80] | verbrennen im herzkü hlen Fehl. |
| [10:10.60] | und altes Lachen, das schaudernd mich macht |
| [10:19.38] | verlacht mich in all dem Weh'. |
| [11:12.74] | 2 |
| [12:40.92] | Es ruhen die Tr nen wie junger Regen |
| [13:03.55] | auf bald schon sterbendem Gras |
| [13:11.58] | Sanft schmiegt sich Moos an wittere W nde |
| [13:18.85] | der Herzen die ich nie verga... |
| [13:24.67] | |
| [13:26.68] | Und keine Narbe blieb namenlos, |
| [13:34.20] | im Kampfe der Eitelkeit. |
| [13:41.98] | Verblutend wir blieben im Felde zurü ck |
| [13:49.51] | und lecken die Wunden der Zeit. |
| [13:55.28] | |
| [13:57.79] | Wo die Sehnsucht nach deiner Haut blieb? |
| [14:05.06] | Schreit es in mei' m Kopf allein. |
| [14:12.59] | Auf dass die allein an mir geschehe, |
| [14:20.87] | mit all ihrem Zweifel und Schrei' n. |
| [14:51.82] | 3 |
| [16:23.36] | Das fremde Bett, in das ich am Abend floh, |
| [16:30.76] | war gleich dem des Morgens so kalt. |
| [16:38.54] | Einst waren unsere Herzen vereint, |
| [16:46.32] | vordorrt nun, betrogen und alt. |
| [16:52.28] | |
| [16:54.10] | Ich habe so oft auch gelogen fü r dich, |
| [17:01.62] | egal bei oder mit wem du schliefst. |
| [17:09.15] | Es klebt noch ein fremder Hauch in deinem Haar, |
| [17:16.73] | der gleicht dem D mon vor dem du fliehst. |
| [17:24.08] | |
| [17:24.51] | Seit langem schon wir uns nicht in die Augen sehn, |
| [17:32.04] | weil zu viele Kü sse wir stahl' n. |
| [17:40.06] | Wir schneiden uns Nachts unsere Sü nden ins Fleisch, |
| [17:47.34] | die da mahnen uns ewig der Qual' n. |
| [19:38.76] | 4 |
| [19:57.44] | Noch tausende Burgen wir trunken erklimmen, |
| [20:02.70] | die bald schon Ruinen sind. |
| [20:07.22] | Doch stehen ach noch nicht von steinernen Zinnen, |
| [20:11.99] | dass unsere Tr ume schon sterben im Wind. |
| [00:00.00] | 1 |
| [08:38.85] | Es sinkt die sterbende Sonne, |
| [08:52.35] | blutrot in nebligen Schlaf. |
| [09:00.63] | Es regt sich Bedauern im Herzen, |
| [09:09.42] | wo einst mein Scheitern mich traf. |
| [09:17.41] | |
| [09:18.46] | Es mahnet der Nornen Gesang, |
| [09:26.48] | an so viel schlafendes Einst. |
| [09:35.77] | Es brechen der Liebe Geschichte, |
| [09:44.55] | egal wie ernst du' s auch meinst. |
| [09:52.36] | |
| [09:53.02] | Und meine H nde nun welk wie Papier, |
| [10:01.80] | verbrennen im herzkü hlen Fehl. |
| [10:10.60] | und altes Lachen, das schaudernd mich macht |
| [10:19.38] | verlacht mich in all dem Weh'. |
| [11:12.74] | 2 |
| [12:40.92] | Es ruhen die Tr nen wie junger Regen |
| [13:03.55] | auf bald schon sterbendem Gras |
| [13:11.58] | Sanft schmiegt sich Moos an wittere W nde |
| [13:18.85] | der Herzen die ich nie verga... |
| [13:24.67] | |
| [13:26.68] | Und keine Narbe blieb namenlos, |
| [13:34.20] | im Kampfe der Eitelkeit. |
| [13:41.98] | Verblutend wir blieben im Felde zurü ck |
| [13:49.51] | und lecken die Wunden der Zeit. |
| [13:55.28] | |
| [13:57.79] | Wo die Sehnsucht nach deiner Haut blieb? |
| [14:05.06] | Schreit es in mei' m Kopf allein. |
| [14:12.59] | Auf dass die allein an mir geschehe, |
| [14:20.87] | mit all ihrem Zweifel und Schrei' n. |
| [14:51.82] | 3 |
| [16:23.36] | Das fremde Bett, in das ich am Abend floh, |
| [16:30.76] | war gleich dem des Morgens so kalt. |
| [16:38.54] | Einst waren unsere Herzen vereint, |
| [16:46.32] | vordorrt nun, betrogen und alt. |
| [16:52.28] | |
| [16:54.10] | Ich habe so oft auch gelogen fü r dich, |
| [17:01.62] | egal bei oder mit wem du schliefst. |
| [17:09.15] | Es klebt noch ein fremder Hauch in deinem Haar, |
| [17:16.73] | der gleicht dem D mon vor dem du fliehst. |
| [17:24.08] | |
| [17:24.51] | Seit langem schon wir uns nicht in die Augen sehn, |
| [17:32.04] | weil zu viele Kü sse wir stahl' n. |
| [17:40.06] | Wir schneiden uns Nachts unsere Sü nden ins Fleisch, |
| [17:47.34] | die da mahnen uns ewig der Qual' n. |
| [19:38.76] | 4 |
| [19:57.44] | Noch tausende Burgen wir trunken erklimmen, |
| [20:02.70] | die bald schon Ruinen sind. |
| [20:07.22] | Doch stehen ach noch nicht von steinernen Zinnen, |
| [20:11.99] | dass unsere Tr ume schon sterben im Wind. |
| [00:00.00] | 1 |
| [08:38.85] | 残阳渐堕 |
| [08:52.35] | 朦胧酣眠间,现出血色 |
| [09:00.63] | 追悔莫及的内心瑟缩 |
| [09:09.42] | 这曾是我败却之所 |
| [09:18.46] | 诺恩女神循循善诱的歌儿 |
| [09:26.48] | 给那如许曾在睡梦中的蒙昧 |
| [09:35.77] | 去吧,把爱的宿命击碎 |
| [09:44.55] | 无论这对你是怎样的意味 |
| [09:53.02] | 我的双手现已枯槁 |
| [10:01.80] | 愈加冷静,当我历经燃烧 |
| [10:10.60] | 那令我颤抖的苍老 |
| [10:19.38] | 用尽全部的苦难对我嘲笑 |
| [11:12.74] | 2 |
| [12:40.92] | 泪洒如飘雨 |
| [13:03.55] | 如茵的草坪很快便会亡故 |
| [13:11.58] | 墙根轻轻巢着绿苔 |
| [13:18.85] | 我从未将那颗心忘去 |
| [13:26.68] | 没无有创伤仍不可名状地留存 |
| [13:34.20] | 于这浮华的斗争 |
| [13:41.98] | 我们待在后方,鲜血流尽 |
| [13:49.51] | 舐着时光的伤痕 |
| [13:57.79] | 欲望何去?曾在你肤下 |
| [14:05.06] | 它在我脑海中兀自喧哗 |
| [14:12.59] | 只降临于我 |
| [14:20.87] | 她全部的疑讶 |
| [14:51.82] | 3 |
| [16:23.36] | 我逃离的奇怪床铺,在那晚 |
| [16:30.76] | 如那天早上的一样冰寒 |
| [16:38.54] | 我们曾同心合意 |
| [16:46.32] | 在凋零,蒙骗与衰老之前 |
| [16:54.10] | 我对你有太多的诳惑 |
| [17:01.62] | 毋论何时,与何人,你睡着 |
| [17:09.15] | 你发丝浮泛着陌生粘黏的气息 |
| [17:16.73] | 你奔跑,他看起来如恶魔 |
| [17:24.51] | 许久,已未从对方眼中看到我们 |
| [17:32.04] | 或许,因我们窃取了太多的亲吻 |
| [17:40.06] | 是夜,我们刈除了肉体中的原罪 |
| [17:47.34] | 这里,提醒我们永恒的造化弄人 |
| [19:38.76] | 4 |
| [19:57.44] | 我们沉醉着翻越万千卫城 |
| [20:02.70] | 它们很快地毁崩 |
| [20:07.22] | 可我仍未寻得那石质塔峰 |
| [20:11.99] | 而我们的梦已死在了风中 |